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ललित और दलित साहित्य की वर्गीय अवधारणाएँ

यह लेख देश में विख्यात परीक्षापयोगी पत्रिका 'प्रतियोगिता दर्पण' से लिया गया है ।
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ललित साहित्य - सुधीजनों का कथन है कि साहित्य वही है जो हित की भावना से सन्निहित हो । प्रश्न है, किसका हित ? उत्तर गोस्वामी तुलसीदास जी ने दिया है -

कीरति भनिति भूति भली सोई ।
सुरसरी सम सब कहँ हित होई ।।


कदाचित इसीलिए आचार्य रामचंद्र शुक्ल अपने प्रसिद्द निबंध "कविता क्या है" में अपनी स्थापना करते हुए कहते हैं कि "कविता ही मनुष्य के ह्रदय को स्वार्थ-संबंधों के संकुचित मण्डल से ऊपर उठकर लोक सामान्य भावभूमि पर ले जाती है जहाँ जगत् की नाना गतियों के मार्मिक स्वरुप का साक्षात्कार और शुद्ध अनुभूतियों का संचार होता है ।" अपनी इसी स्थापना को आगे बढाते हुए वह कहते हैं कि "यदि अपने भावों को समेटकर मनुष्य अपने ह्रदय को शेष सृष्टि से किनारे कर ले या स्वार्थ कि पशुवृत्ति में लिप्त रखे तो उसकी मनुष्यता कहाँ रहेगी ? .... इस विश्व काव्य की रसधारा में जो थोड़ी देर के लिये निमग्न न हुआ, उसके जीवन को मरुस्थल की यात्रा ही समझना चाहिए ।"

अब विचारणीय विषय यह है कि शुक्लजी कथित 'इस विश्व-काव्य की रसधारा में कौन 'निमग्न' होगा ?

क्या वह, जो भूखा-अधनंगा है ? या वह, जिसका जीवन सहस्त्राधिक वर्षों से शोषण-दोहन, दमन-उत्पीडन, बेकारी-बेगारी, अभाव-अपमान, गुलामी-गुमनामी का दारुण दंश झेलता रहा है ? जिस मनुष्य-समुदाय को कुत्तों के बीच जूठी पत्तल चाटने के लिए विवश कर दिया गया हो, जिस मानव-समूह के लिए सिर पर मॉल का कनस्तर ढोना ही भाग्य बन गया हो और जिस व्यष्टि समाज के कमजोर कन्धों पर मरे हुए ढोरों को ढोने का बेगार कर्म लाड दिया गया हो, उस अस्पृश्य-अंव्यज मानव-समाज का जीवन आचार्य शुक्ल के 'विश्व-काव्य की रसधारा' में क्योंकर 'निमग्न' होगा ? वस्तुतः ऐसे आचार्य प्रवरों का साहित्य "काव्यशास्त्र विनोदेन कालोगच्छती धीमताम्" के परजीवी सामंती सूत्र पर आधारित है । यह साहित्य उस अकर्मण्य विलासी साहित्यकार की कलाम से सिरजा गया है जिसने कभी ठूंठ वृक्ष को देखकर कहा था - 'नीरस तरुरिह विलसती पुरतः ।'

यही है ललित(परम्परागत) साहित्य, जो सिर्फ स्वप्न बुनता है, केवल स्वप्न देखता है, सपने में खता-पीता, सोता-जगता और चलता-फिरता है । इसी साहित्य के लिए 'रमणीयार्थ प्रतिपादाकं वाक्यं काव्यम्' तथा 'रसात्मकं वाक्यं काव्यम्- जैसे शब्द-विधान किये गये थे । यह साहित्य कथनी में 'मीठी खाँड' है- 'अयं निजः परावैती गणना लघुचेतसाम्' का मिथ्या सिद्धांत बघारने वाला, किन्तु करनी में 'विष की लोच' है-'ढोल गँवार शूद्र पशु नारी, ये सब ताडन के अधिकारी' की कठोर प्रताड़ना देने वाला ।

अतः हँस (कथा-मासिक) के सम्पादक राजेन्द्र यादव का यह कथन यहाँ प्रासंगिक प्रतीत होता है कि "नगेन्द्र (शुक्ल जी भी) रस-सिद्धांत की चाहे जितनी महिमा गाते रहें, लेकिन वह सिद्धांत आज के साहित्य को, हमारी आज की संवेदना को समझने में कहाँ मदद देता है ? पुराने जमाने में जीवन का उद्देश्य मोक्ष था, तो साहित्य का उद्देश्य एक निर्विकल्प समाधि (अनिर्वचनीय आनन्द) था ..... कहना चाहिए कि एक ऐसी मुक्तावस्था, जिसमें आप दुनिया भर को भूल जाएँ ..... वह फुरसती, परजीवी लोगों का साहित्य था, जिन्होंने अपने साहित्य के केंद्र में वे चीज़ें रखीं जो लगभग मोक्ष जैसी थीं । उसके बाद जहाँ हम आए हैं वहाँ साहित्य का पतन या विकृतिकरण यहाँ तक हुआ कि वह साहित्य नायिका-भेद और लक्षण-शास्त्र में आकर ख़त्म हो गया ।"
('युद्धरत आम आदमी'(त्रैमासिक), अप्रैल-जून 2000, अंक 50, पृष्ठ 61-65 से साभार)

दलित साहित्य - यहाँ यह प्रश्न स्वभावतः उठ खड़ा होता है कि दलित साहित्य की अवधारणा के अंतर्गत वह कौन-सी विषय-वस्तु है जिसके सम्बन्ध में आज साहित्य से जुड़े लेखक, विचारक, चिन्तक, पाठक, समीक्षक आदि के बीच वाक्-युद्ध छिड़ा हुआ है ? उत्तर है, वह विषय-वस्तु है पाठ, पाठ की अन्तर्वस्तु , पाठ के स्वरुप तथा पाठ में आए विचार एवं समाज-दर्शन । इसलिए दलित साहित्य के समर्थ रचनाकार ओमप्रकाश वाल्मीकि यह कहते देखे-सुने जाते हैं कि "वर्णव्यवस्था से उपजी घोर अमानवीयता, समता-स्वतंत्रता-विरोधी सामाजिक अलगाव की पक्षधर सोच को परिवर्तित कर बदलाव की प्रक्रिया को तेज करना दलित साहित्य की मूलभूत संवेदना है ....... अतः अम्बेडकर और ज्योतिबा फुले की जीवन-दृष्टि दलित साहित्य की उर्जा है ।"
(प्रज्ञा साहित्य, मार्च-जून 1995, पृष्ठ 8)

यही कारण है कि दलित साहित्यकारों ने मनुवाद का घोर विरोध किया है और भारतीय समाज में व्याप्त व्यापक असमानता एवं अमानवीय अस्पृश्यता पर आक्षेप करते हुए क्षोभ, आक्रोश एवं प्रतिक्रिया जाहिर की है, लेकिन यह सच है कि उनकी ये रचनात्मक प्रतिक्रियाएं घृणा, शत्रुता एवं प्रतिशोधभाव की हद तक चली गयी हैं ।

बहरहाल, हिंदी साहित्य में शूद्र जातियों के जीवन से जुड़े रचना-कर्म का प्रारम्भ सहज यानी सिद्ध सरहपा, निर्गुणिया संत कबीर, रैदास, मुक्ताबाई वगैरह से लेकर राजकवि मात्तंग, स्वामी अछूतानन्द हरिहर, हीरा डोम आदि तक विकास की प्रक्रिया अपनाता है और बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर रचित 'मेरा जीवन' के प्रेरक सन्देश को ग्रहण करते हुए मराठी साहित्य के दलितोत्थान के उभार के साथ विगत अस्सी के दशक तक (नागपुर दलित साहित्य-सम्मलेन, 1976 तक) दलित साहित्य के नाम-रूप में उद्दघोषित व स्थापित हो जाता है । यही, इसी सम्मलेन से, दलित साहित्य से जुड़े अधिसंख्य लेखक व विचारक यह मानने और दुराग्रह पालने लगते हैं कि "वास्तविक दलित साहित्य वही है जो दलितों द्वारा लिख गया है और गैर-दलितों द्वारा दलित जीवन पर लिख गया साहित्य 'दलित चेतना का साहित्य' अथवा 'दलित सहानुभूति का साहित्य से कतई ऊपर नहीं है ।"

लेकिन इस विचार के विपरीत जब राजकुमार सैनी, तुलसीराम तथा दयानंद 'बटोही' प्रभृति दलित लेखक-विचारक दलित साहित्य में गैर-दलित साहित्यकारों की रचनाओं को, मसलन-निरालाकृत 'चतुरी-चमार', अम्रतलाल नागर-रचित 'नाच्यौ बहुत गोपाल', गोपाल उपाध्याय-लिखित 'एक टुकड़ा इतिहास', डॉ. रांगेयराघव की आंचलिक रचना 'कब तक पुकारूँ', जगदीशचंद्र के उपन्यास 'नर्कुंद में वास' अबुल बिस्मिल्लाह के 'मुखड़ा क्या देखें', वीरेंद्र जैन कथित 'डूब' तथा नागार्जुन की कविता 'हरिजन गाथा' को शुमार करने की माँग करते हैं, तो इस माँग में उनकी समन्वयात्मक दृष्टि ही काम करती दिखती है । दलित लेखक डॉ. 'बटोही' तो अपनी इस स्थापना पर और अधिक बल देते हुए कहते हैं कि "यह आम धारणा रही है कि दलित साहित्य दलित साहित्यकारों की रचनाएँ हैं, लेकिन ऐसा दुराग्रह, ऐसा कोई बंधन साहित्य के लिए कदापि संभव नहीं है । कबीर और रैदास, प्रेमचंद और निराला कोई भी दलित साहित्यकार हो सकता है ।" डॉ। 'बटोही' की दृष्टि में, "दलित साहित्य एक ऐसा साहित्य है जो सभी तरह की वर्णव्यवस्था, जात-पात, ऊँच-नीच के भेदभाव के दायरे से ऊपर है और जिसे धर्म, भाषा और प्रदेश की सीमा में बाँधा नहीं जा सकता ।" अतः वे आगे सारे विवादों पर मानों विराम लगाते हुए कहते हैं कि "ऐसे सभी साहित्यकार जो दलितोत्थान के लिए रचना करते हैं, वे दलित साहित्यकार कहलाते हैं ।"

वैसे चाहे ललित साहित्य हो अथवा दलित साहित्य, दोनों की कुछ सीमाएं हैं । दोनों का प्रगतिशील जनवाद केवल अपने-अपने समग्र पुरुष को केंद्र में रखकर देखता है और उसी के सुख-दुःख, मान-अपमान , आशा-निराशा, अभाव-आस्था, कुंठा-घुटन, संघर्ष को मुख्यरूपेण उकेरता है । जहाँ उनकी स्त्रियाँ उनके लिए या तो 'भोग' की वस्तु बनकर रह गयी हैं या 'सेवा' की अथवा घर-आँगन में बंद शोभा की । सच पूँछा जाए तो ये स्त्रियाँ एक (सवर्ण) के लिए तुलसी बाबा के 'मानस' की देवी सती-साध्वी सीता बनकर जी रही है या छायावादी प्रसादकृत 'कामायनी' की श्रद्धा बनकर और दूसरे(दलित) के लिए 'दोहरा अभिशाप' की कौसल्या वैसंत्री एवं 'आलोआंधारी' की बेबी हालदार होकर, जो अपने-अपने पतियों के दलन-उत्पीडन को आजीवन झेलने-सहने हेतु अभिशप्त हैं ।

एक प्रगतिशील जनवादी कवि नारी-जीवन की गुलामी को यों प्रस्तुत करता है :

बचपन में कहा लोगों ने
छोटी बच्ची है,
कुछ जानती-वानती नहीं,
बैठ जा चुपचाप ।
जवानी में कहा लोगों ने
गरम खून है,
भला-बुरा जानती नहीं,
बैठ जा चुपचाप ।
बुढापे में कहा फिर लोगों ने
बुड्ढी है,
अब करेगी भी क्या ?
बैठ जा चुपचाप ।

4 comments:

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर रचना

दिगम्बर नासवा said...

सच है अनिल जी .. नारी तो सदेव ही अधीन रही है पुरुष के ........ मानसिक रूप से अधिक शक्ति शालि होते हुवे भी मर्द उसे दबाता रहता है ..... अपना वर्चस्व जो रखना चाहता है .........

लवली कुमारी / Lovely kumari said...

अच्छा विषय चुना है अनिल आपने ..आगे भी ऐसी प्रस्तुति की अपेक्षा रहेगी.

JHAROKHA said...

SACHHI BAAT KAHI HAI aNIL JI .AAJ BHI SAMAJ ME NAARI KO JHUKANA HI PAdTA HAI.CHAHE AAJ KE YUG ME NAARI KITANI HI AAGE BAdH JAYE PAR YAH BAAT NAARI PAR JANM SE JEEVAN PRYANT TAK PITA, BHAI VA PATI AUR ANT MAIN BETON KE AADHIIN HONA HI PADTA HAI .
POONAM

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