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इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में महिला की छवि

भारत में इलेक्ट्रोनिक मीडिया पिछले 15-20 वर्षों में घर घर में पहुँच गया है फिर चाहे वह शहर हो या ग्रामीण क्षेत्र । इन शहरों और कस्बों में केबिल टीवी से सैकड़ो चैनल दिखाए जाते हैं । समाचार चैनलों, मनोरंजन चैनलों तथा अन्य धार्मिक चैनलों पर महिला की जो छवि दिखाई जा रही है वह उसके संघर्ष की गाथा कम गाती है । न तो वह उनकी उपलब्धियां गिनाती, न इस उद्देश्य की और उनका ध्यान है । इसके बजाय वो महिला की सुन्दरता, कमनीयता, परिधानों, रसोईघर एवं घर के कामकाज में रूचि का उल्लेख ही अधिक करते हैं ।

भले ही मीडिया अपनी और से महिला को आधुनिक एवं स्वतंत्र महिला के रूप में प्रस्तुत करने का दावा क्यों न करता हो ? वास्तविकता तो यही है कि वह महिला को एक उपभोक्ता के रूप में दर्शाता है । यह तो सीधे तौर पर महिला का अपमान है और इसका सम्बन्ध उसकी वास्तविक चिंताओं से तो कतई नहीं है । आर्थिक एवं सामजिक सरोकारों से जुद्दे मुद्दों पर जो भी साक्षात्कार इन चैनलों पर दिखाए जाते हैं उनमें 80% से अधिक की भागीदारी पुरुषों की होती है ।

यहाँ तक की पंचायती राज व्यवस्था में महिलाओं के आरक्षण जैसे मुद्दों पर भी पुरुषों को ही प्रधानता दी जाती है । चैनलों पर दिखाए जाने विज्ञापनों में महिला को एक वस्तु के रूप में ही दर्शाया जाता है । नहीं तो भला पुरुष के शेविंग के साधनों के विज्ञापनों में महिला का क्या काम ? मनोरंजन के नाम पर दिखाए जाने वाले सीरियलों में महिला को एक षड्यंत्रकारी और चाले चलने वाले रूप में दिखाया जाता है । नारी देह का प्रदर्शन जिस रूप में टीवी पर किया जाता है वह शर्मसार ही करता है । वह उसकी वास्तविक छवि से मेल नहीं खाता ।

भारतीय महिलाओं ने जहाँ राजनीतिक, प्रशासन, अर्थजगत, शिक्षा, विज्ञान, खेलकूद, अन्तरिक्ष एवं प्रबंध में अनेकों उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हासिल की हैं । वहीँ वह अभी भी इन सभी क्षेत्रों में उच्चतम के लिये संघर्षरत है । यह सभी उपलब्धियाँ उसने पुरुष प्रधान मानसिकता के वातावरण में ही हासिल की हैं । ऐसी उपलब्धियों को हासिल करने वाली महिलाओं से लिये गये साक्षात्कार में ऐसे प्रश्न पूछे जाते हैं कि वे स्वंय को असहज महसूस करती हैं जबकि पुरुषों के साथ ऐसा नहीं । आज के समय तक भी इलेक्ट्रोनिक मीडिया संघर्षशील महिला की छवि प्रस्तुत करने में ईमानदारी नहीं दिखा रहा है ।

4 comments:

निर्मला कपिला said...

ापकी हर बात से सहमत हूँ बहुत अच्छा सवाल उठाया है धन्यवाद और शुभकामनायें

दिगम्बर नासवा said...

अच्छा मुद्दा उठाया है अनिल जी .........

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर बात कही आप ने लेकिन आज कई महिलाये इसे ही आजादी समझती है, जब कि यह है नही.आप के लेख से सहमत हुं

प्रकाश पाखी said...

अच्छा सवाल!सुंदर बात!!सहमत!!!

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