अजीब दिन थे ।
जब शामें सूरज के ढलने के बाद शुरू होती थीं ।
जब रातों के जल्दी बीत जाने का मलाल हुआ करता था ।
जब खुशियों को ढूँढते रहने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी ।
जब समय दबे पाँव आकर गुज़रता जाता था ।
जब ना ख्वाहिशों ने जन्म लिया था और न आरजूयें थी ।
जब दोस्तों के काफिले थे और हुडदंगों के मेले ।
जब क़हक़हे गूंजा करते थे, बस किसी भी ज़रा सी बात पर ।
जब बीते, तो साथ ले जाते रहे अपने साथ ही वो सिलसिले ।
अजीब दिन थे...
होली की बधाई
4 hours ago








9 comments:
मनोभावों को सुन्दर शब्द दिए हैं। बधाई।
जब रातों के जल्दी बीत जाने का मलाल हुआ करता था ।
-क्या बात है..वाकई, क्या अजीब दिन थे.. सुन्दर!!
क्या बात है
यादो का सिलसिला है
kya baat hai....bahut hi acchi poem likhi hai...
Are you jealous of the age in which I am living,
Grat post.
yeah, great post... and so true...
and beautiful.
वाह अनिल जी ....... किन दिनो की याद करा दी ............ क्यों करा दी ........ खेंच कर ले गये दूसरी दुनिया में फिर से आपकी कलम .............
बस वही अजीब दिन तो जिन्दगी के असली दिन होते हैं मित्र।
nice
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