Thursday

अजीब दिन थे

अजीब दिन थे ।
जब शामें सूरज के ढलने के बाद शुरू होती थीं ।
जब रातों के जल्दी बीत जाने का मलाल हुआ करता था ।
जब खुशियों को ढूँढते रहने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी ।
जब समय दबे पाँव आकर गुज़रता जाता था ।
जब ना ख्वाहिशों ने जन्म लिया था और न आरजूयें थी ।
जब दोस्तों के काफिले थे और हुडदंगों के मेले ।
जब क़हक़हे गूंजा करते थे, बस किसी भी ज़रा सी बात पर ।
जब बीते, तो साथ ले जाते रहे अपने साथ ही वो सिलसिले ।
अजीब दिन थे...

9 comments:

परमजीत बाली said...

मनोभावों को सुन्दर शब्द दिए हैं। बधाई।

Udan Tashtari said...

जब रातों के जल्दी बीत जाने का मलाल हुआ करता था ।

-क्या बात है..वाकई, क्या अजीब दिन थे.. सुन्दर!!

M VERMA said...

क्या बात है
यादो का सिलसिला है

Shobhna Choudhary said...

kya baat hai....bahut hi acchi poem likhi hai...

Shri Krishna said...

Are you jealous of the age in which I am living,
Grat post.

नन्हीं लेखिका - Rashmi Swaroop said...

yeah, great post... and so true...
and beautiful.

दिगम्बर नासवा said...

वाह अनिल जी ....... किन दिनो की याद करा दी ............ क्यों करा दी ........ खेंच कर ले गये दूसरी दुनिया में फिर से आपकी कलम .............

Rajey Sha said...

बस वही अजीब दि‍न तो जि‍न्‍दगी के असली दि‍न होते हैं मि‍त्र।

Suman said...

nice

Post a Comment

आपके सुझाव और आपकी टिप्पणी का स्वागत है :